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कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत बन और तेरी अकर्म में भी आसक्ति न हो।
भगवद् गीता 2.47 · अर्थ सहित पढ़ेंविषय से देखें
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ग्रंथभगवद् गीताभगवद् गीता कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में कृष्ण और अर्जुन के बीच सात सौ श्लोकों का संवाद है। अठारह अध्यायों में यह कर्म, भक्ति और ज्ञान के मार्गों को…
देवताविष्णुभगवान विष्णु सृष्टि के पालनकर्ता हैं और ब्रह्मा तथा शिव के साथ त्रिमूर्ति में से एक हैं। वे क्षीरसागर में शेषनाग पर लक्ष्मी के साथ विराजते हैं, गरुड़…
ग्रंथरामायणरामायण भारत के दो महान संस्कृत महाकाव्यों में से एक है। लगभग २४,००० श्लोकों में महर्षि वाल्मीकि विष्णु के सातवें अवतार श्रीराम का जीवन — वनवास, सीता हरण,…
पात्रकर्णकर्ण महाभारत के महान दुखांत नायकों में से एक हैं — कुंती और सूर्यदेव के पुत्र, पर सूतपुत्र के रूप में पले। अपनी दानशीलता, कौशल और वचनबद्धता के…
कथासमुद्र मंथनसमुद्र मंथन क्षीरसागर का महान मंथन है, जिसमें देव और असुर मिलकर अमृत पाने के लिए सागर को मथते हैं। इससे अनेक रत्न, हलाहल विष और अंत में…
आरतीहनुमान चालीसाहनुमान चालीसा गोस्वामी तुलसीदास द्वारा अवधी में रचित चालीस चौपाइयों और तीन दोहों का स्तोत्र है। इसमें हनुमान जी के बल, बुद्धि, रामभक्ति और संकटमोचन स्वरूप की स्तुति…दो महान महाकाव्य
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