इस कथा के पात्र
कथा
अपना खोया बल और अमरत्व पाने के लिए देवों और असुरों ने मिलकर क्षीरसागर को मथने का निश्चय किया। उन्होंने मंदराचल पर्वत को मथानी और वासुकि नाग को रस्सी बनाया, जबकि विष्णु ने कच्छप (कूर्म) रूप धारण कर पर्वत को अपनी पीठ पर संभाला। मंथन से लक्ष्मी, कामधेनु, चंद्रमा सहित अनेक रत्न निकले, और हलाहल विष भी, जिसे सृष्टि की रक्षा हेतु शिव ने पिया। अंत में धन्वंतरि अमृत का कलश लेकर प्रकट हुए।








