

मंथरा रानी कैकेयी की कुबड़ी दासी है, जो राम के राज्याभिषेक की पूर्व संध्या पर कैकेयी को राम के विरुद्ध कर देती है। उसकी बातों से वह घटनाक्रम शुरू होता है जो राम को चौदह वर्ष के वनवास में भेजता है।
मंथरा कौन थे?
मंथरा कैकेयी के साथ केकय से आई थी और बचपन से उनकी सेवा करती है। महल की छत से वह अयोध्या को राम के अभिषेक के लिए सजा देखती है और घबराकर कैकेयी के पास दौड़ती है।
पहले कैकेयी प्रसन्न होकर मंथरा को आभूषण देती हैं। मंथरा धैर्य से तर्क देती है कि राम के अभिषेक से भरत दास बन जाएँगे। वह कैकेयी को दशरथ के दिए दो वर याद दिलाती है और भरत के अभिषेक तथा राम के वनवास की माँग करने को कहती है।
भरत के लौटने पर शत्रुघ्न क्रोध में मंथरा को पकड़ लेते हैं, पर भरत उन्हें रोकते हैं। परंपरा में उसका नाम विषैले सलाहकार का पर्याय बन गया है।
वाल्मीकि रामायण में
मंथरा 1 कांडों के 4 सर्गों में आते हैं।







