कथा
रामायण की सबसे प्यारी कथाओं में एक राम और केवट की भेंट है। इसमें न युद्ध है न राक्षस, फिर भी भक्त इसे बहुत प्रेम से स्मरण करते हैं।
केवट की शर्त
शृंगवेरपुर में गंगा पार करने के लिए केवट ने पहले राम के चरण धोने की हठ की, यह कहकर कि कहीं चरण-रज से उसकी नाव, जो उसकी आजीविका है, अहल्या की तरह नारी न बन जाए। राम मुस्कुराकर मान गए।
चरण धोना और पार उतारना
केवट ने प्रेम से राम के चरण धोए, वह चरणामृत पिया, और फिर सीता और लक्ष्मण सहित राम को पार उतारा।
अमूल्य उतराई
सीता ने अंगूठी देनी चाही, पर केवट ने मना कर दिया: "हम दोनों खेवैये हैं; मैं नदी पार कराता हूं, आप भवसागर।" उसने केवल मुक्ति का वर मांगा। केवट शबरी के साथ राम के प्रिय भक्तों में गिने जाते हैं।
अर्थ और सीख
कथा सिखाती है कि भक्ति के लिए धन, जाति या विद्या नहीं, केवल प्रेममय हृदय चाहिए; प्रभु निष्काम प्रेम से ही प्रसन्न होते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
केवट कौन थे?
केवट ने पहले चरण क्यों धोए?
केवट ने उतराई क्यों नहीं ली?
यह कथा कहां घटी?
स्रोत
- तुलसीदास कृत रामचरितमानस, अयोध्या कांड
- वाल्मीकि रामायण, अयोध्या कांड (गुह और गंगा-पार)
- विकिपीडिया, गुह (अक्टूबर 2026)
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