इस कथा के पात्र
कथा
राज्याभिषेक की संध्या
पूरी अयोध्या राम के युवराज-अभिषेक के लिए सजी थी। पर उसी रात आनंद शोक में बदल गया — रामायण की महान परीक्षा का आरंभ।
मंथरा का विष
दासी मंथरा ने रानी कैकेयी को भय से भर दिया कि राम के राजा बनते ही वह और भरत निर्धन हो जाएंगे। कैकेयी ने अपने दो वर याद किए।
दो वर
उन्होंने मांगा: भरत का राज्य और राम का चौदह वर्ष का वनवास। दशरथ टूट गए, पर राजा का वचन ही धर्म था। राम ने स्वयं सबको धीरज दिया और शांति से वनवास स्वीकारा।
वन की ओर
राम ने वल्कल पहने। सीता ने साथ चलने का हठ किया, लक्ष्मण भी साथ हो लिए। पूरी नगरी रोती हुई नदी तट तक साथ आई। दशरथ राम-वियोग सह न सके और कुछ दिनों में प्राण त्याग दिए।
अर्थ
वनवास रामायण का महान मोड़ है। राम का शांत स्वीकार — सिंहासन पर पिता का सम्मान और धर्म चुनना — मर्यादा का आदर्श है, इसीलिए वे मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते हैं।
अर्थ और सीख
राम का वनवास का शांत स्वीकार मर्यादा का आदर्श है — इसीलिए वे मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
राम को वनवास क्यों मिला?
क्या राम ने विरोध किया?
राम के साथ कौन गए?
दशरथ का क्या हुआ?
राम मर्यादा पुरुषोत्तम क्यों?
स्रोत
- वाल्मीकि रामायण, अयोध्या काण्ड; रामचरितमानस
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