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कथाValmiki Ramayana, Ayodhya Kandaवाल्मीकि रामायण, अयोध्या काण्ड; रामचरितमानस

भरत और पादुका

माँ द्वारा दिलाया गया सिंहासन भरत ने ठुकरा दिया, चित्रकूट जाकर राम को लौटने की विनती की, और राम की पादुकाएँ सिंहासन पर रखकर चौदह वर्ष सेवक के रूप में शासन किया।

1 मिनट में पढ़ें · अपडेट 24 Oct 2026

इस कथा के पात्र

कथा

वह सिंहासन जो उसने नहीं लिया

जब भरत ननिहाल से अयोध्या लौटे, तो दशरथ का देहांत, राम का वनवास और सिंहासन उनकी प्रतीक्षा में मिला — सब कैकेयी का किया। भरत आहत हो गए और ऐसे अन्याय से मिला ताज ठुकरा दिया।

चित्रकूट की यात्रा

भरत प्रजा, मंत्रियों और माताओं के साथ राम को लौटाने वन गए। चित्रकूट में दोनों भाई रोए। राम ने कोमलता से समझाया कि पिता का वचन निभाना है।

सिंहासन पर पादुका

भरत ने स्वयं सिंहासन पर नहीं बैठे। उन्होंने राम की पादुका मांगी और उन्हें सिर पर धारण कर लाए, सिंहासन पर रखा, और नंदिग्राम में तपस्वी जीवन बिताते हुए सेवक के रूप में शासन किया।

अर्थ

भरत निःस्वार्थ त्याग और भ्रातृ-प्रेम का आदर्श हैं। सिंहासन पर पादुका सत्ता को धरोहर मानने का अमर प्रतीक बन गई।

अर्थ और सीख

भरत निःस्वार्थ त्याग का आदर्श हैं। सिंहासन पर पादुका — सत्ता को धरोहर मानने का प्रतीक।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भरत ने सिंहासन क्यों ठुकराया?
क्योंकि वह अन्याय से मिला था; राम ही सच्चे राजा थे।
भरत ने राम की पादुका का क्या किया?
सिर पर लाकर सिंहासन पर रखी और सेवक के रूप में शासन किया।
वनवास के दौरान भरत कहाँ रहे?
नंदिग्राम में तपस्वी जीवन।
क्या भरत ने राम से भेंट की?
हाँ, चित्रकूट में।
भरत किसका प्रतीक हैं?
निःस्वार्थ प्रेम और त्याग।

स्रोत

  1. वाल्मीकि रामायण, अयोध्या काण्ड; रामचरितमानस

पढ़ें हमारी संपादकीय नीति कि शास्त्र, पुराण और लोक परंपरा को कैसे चिह्नित किया जाता है।