कथा
लंका के महायुद्ध से पूर्व राम ने वाली-पुत्र अंगद को दूत बनाकर रावण की सभा में भेजा। यह प्रसंग रामायण के सबसे ओजस्वी दृश्यों में से एक है।
शांति का अंतिम प्रस्ताव
अंगद ने निर्भीक होकर रावण को सीता लौटाने और विनाश से बचने का संदेश दिया। रावण ने उपहास किया और उसे पकड़ने का आदेश दिया।
जमा हुआ पांव
अंगद ने सभा में अपना पांव जमाकर कहा: जो इसे हिला दे, राम लौट जाएंगे। लंका का कोई वीर उसे हिला तक न सका।
रावण से वचन
जब रावण स्वयं उठा, तो अंगद ने कहा: "मेरा पांव मत पकड़ो; यदि रक्षा चाहते हो तो राम के चरण पकड़ो।" लज्जित रावण निरुत्तर हो गया, और अंगद गर्जता हुआ लौट आया।
अर्थ और सीख
कथा सिखाती है कि धर्मी युद्ध से पहले शांति चाहते हैं, और धर्म पर अटल रहने वाले को अहंकार और बुराई की सारी शक्ति भी नहीं हिला सकती।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अंगद कौन थे?
राम ने अंगद को क्यों भेजा?
अंगद की चुनौती क्या थी?
क्या कोई पांव हिला सका?
स्रोत
- वाल्मीकि रामायण, युद्ध कांड (अंगद का दूत-कार्य)
- तुलसीदास कृत रामचरितमानस, लंका कांड
- विकिपीडिया, अंगद (अक्टूबर 2026)
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