कथा
काली और रक्तबीज की कथा देवी माहात्म्य में आती है, और इसी युद्ध से उग्र काली पहली बार प्रकट होती हैं।
अवध्य दानव
शुंभ-निशुंभ के सेनापति रक्तबीज को वर था कि उसके रक्त की हर बूंद से, जो धरती पर गिरे, नया रक्तबीज जन्मेगा। दुर्गा के प्रहार से उसका रक्त बहा और हर बूंद से नए दानव उठ खड़े हुए।
काली का प्राकट्य और वध
तब देवी के क्रोध से काली प्रकट हुईं, और जैसे ही दुर्गा ने रक्तबीज पर प्रहार किए, काली ने उसका रक्त धरती पर गिरने से पहले पी लिया और क्लोनों को निगल लिया। रक्त शेष न रहा, और रक्तबीज मारा गया।
शिव पर ठहराव
युद्ध का उन्माद न थमा, और काली का तांडव धरती को कँपाने लगा। शिव उनके मार्ग में लेट गए, और उन पर पग पड़ते ही काली लज्जा से जिह्वा दबाकर ठहर गईं। यही क्षण काली की प्रतिमा में सदा अंकित है।
अर्थ और सीख
रक्तबीज अहंकार और वासना का प्रतीक है, जो सीधे प्रहार से और बढ़ता है। काली उसके मूल को ही पी जाती हैं, यह सिखाते हुए कि तृष्णा का अंत बाहरी युद्ध से नहीं, उसकी जड़ को निगलने से होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
रक्तबीज कौन था?
रक्तबीज का वध कैसे हुआ?
काली ने रक्त क्यों पिया?
यह कथा कहाँ है?
स्रोत
- देवी माहात्म्य (मार्कण्डेय पुराण), अध्याय 7-8
- कालिका पुराण
- विकिपीडिया, रक्तबीज और काली (अक्टूबर 2026)
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