गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला।
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला।
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली।
लतन में ठाढ़े बनमाली, भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक,
चंद्र सी झलक, ललित छवि श्यामा प्यारी की॥
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
Gale mein Baijanti mala, bajavai murli madhur bala
Shravan mein kundal jhalkala, Nand ke anand Nandlala
Gagan sam ang kanti kali, Radhika chamak rahi aali
Latan mein thadhe Banmali, bhramar si alak, kasturi tilak
Chandra si jhalak, lalit chhavi Shyama pyari ki
Shri Giridhar Krishna Murari ki
गले में वैजयन्ती माला है और बालकृष्ण मधुर मुरली बजा रहे हैं। कानों में कुण्डल झलक रहे हैं; वे नन्द के आनन्द नन्दलाल हैं। उनके अंगों की कान्ति आकाश के समान श्याम है और साथ में राधा जी चमक रही हैं। लताओं के बीच वनमाली खड़े हैं, भौंरे जैसी अलकें, कस्तूरी का तिलक और चन्द्रमा जैसी झलक — श्यामा प्यारी के प्रियतम की सुन्दर छवि है।