इस कथा के पात्र
कथा
दीपावली का चौथा दिन
गोवर्धन पूजा, जिसे अन्नकूट भी कहते हैं, मुख्य दीपावली के अगले दिन आती है। यह कृष्ण के बाल्यकाल की सबसे प्रिय कथाओं में से एक, गोवर्धन पर्वत उठाना, का उत्सव है।
इंद्र का अहंकार
व्रज के ग्वाले हर वर्ष वर्षा के स्वामी इंद्र की पूजा करते थे। बाल कृष्ण ने पूछा, क्या गोवर्धन, वन और गायें ही उन्हें घास, जल और आश्रय नहीं देतीं? उन्होंने गाँव को पर्वत और भूमि की पूजा के लिए मनाया। इंद्र ने क्रुद्ध होकर प्रलयंकारी वर्षा भेजी।
एक उंगली पर पर्वत
जल बढ़ता देख कृष्ण ने पूरा गोवर्धन पर्वत बाएं हाथ की कनिष्ठा पर उठालिया और छाते की तरह थाम लिया। सात दिन-रात पूरा गाँव और उनकी गायें उसके नीचे सुरक्षित रहे। इंद्र ने लज्जित होकर वर्षा रोकी और कृष्ण को नमन किया।
अन्नकूट
इसी की याद में भक्त चावल, मिष्ठान और अनेक व्यंजनों का अन्नकूट बनाकर कृष्ण और गोवर्धन को अर्पित करते हैं। गायों को नहлाकर सजाया जाता है।
अर्थ
गोवर्धन पूजा प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और विनम्रता का पर्व है। कृष्ण सिखाते हैं कि भक्ति भय से नहीं, जो जीवन को पालता है, भूमि, गोधन, पर्वत, उसके प्रति आभार से आती है।
अर्थ और सीख
गोवर्धन पूजा प्रकृति के प्रति आभार और विनम्रता का पाठ है, जो जीवन को पालता है उसका सम्मान।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गोवर्धन पूजा क्या है?
कृष्ण ने गोवर्धन क्यों उठाया?
अन्नकूट क्या है?
कृष्ण ने पर्वत कितने समय थामा?
गोवर्धन पूजा क्या सिखाती है?
स्रोत
- भागवत पुराण, दशम स्कंध (गोवर्धन-लीला)
- विष्णु पुराण
- पुष्टिमार्ग अन्नकूट परंपरा
पढ़ें हमारी संपादकीय नीति कि शास्त्र, पुराण और लोक परंपरा को कैसे चिह्नित किया जाता है।



