वैदिक कथा

दीपावली पर रंगोली: अर्थ, डिजाइन और परंपरा

द्वार पर रंगोली दीपावली की सबसे पुरानी परंपराओं में से एक है, लक्ष्मी का स्वागत, दहलीज का आशीर्वाद, और माँ से बेटी तक चली आ रही जीवंत लोककला।

दहलीज पर रंग

दीपावली पर दीप जलने से पहले ही कई घर द्वार पर रंगोली से सज जाते हैं, रंगीन चूर्ण, चावल के आटे, फूलों या रेत से फर्श पर बने आकृति-प्रतीक।

लक्ष्मी का स्वागत

रंगोली का पहला उद्देश्य स्वागत है। द्वार पर बनी यह लक्ष्मी को सुंदर दहलीज पार करने का निमंत्रण देती है। कमल, लक्ष्मी के चरण-चिह्न, दीया, स्वस्तिक और ज्यामितीय तारे शुभता के प्रतीक हैं।

बनाने में अर्थ

परंपरा में रंगोली चावल के आटे से बनती थी, ताकि चींटी, पक्षी और जीव उसे खा सकें, सजावट में ही सब जीवों की भरणा का भाव। रोज सुबह नई बनती और दिन भर में मिट जाती रंगोली अनित्यता का कोमल पाठ भी है।

दीपावली की रंगोली

दीपावली की रंगोली सबसे विस्तृत और रंगीन होती है: कमल, मोर, दीप-किनारे और बिंदुओं को जोड़ती आकृतियाँ। कई लोग अब फूल-रंगोली और जल पर तैरती रंगोली भी बनाते हैं।

जीवंत परंपरा

रंगोली प्रायः घर की स्त्रियाँ बनाती हैं और यह माँ से बेटी तक पहुँचती है, कला, भक्ति और दैनिक जीवन को जोड़ती एक परंपरा।

अर्थ और सीख

रंगोली कला, भक्ति और दैनिक जीवन को जोड़ती है, घर की साधारण दहलीज को पवित्र के स्वागत योग्य बनाती है।

वैदिक कथा

दीपावली पर रंगोली: अर्थ, डिजाइन और परंपरा

स्रोतों सहित पूरी कथा, पात्र और अर्थ वैदिक कथा पर।